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कई पैरेंट्स में पेशंस की बहुत कमी होती है। बच्चे ने अगर एक बार कुछ याद न किया तो उन्हें जबरदस्ती डांट फटकार लगाकर या कभी-कभी तो याद कराने के लिए उन पर जोर देते हैं और जरूरत पड़ने पर उन पर हाथ तक उठा देते हैं। ऐसा करना न केवल आपके लिए नुकसानदायक है बल्कि आपके बच्चे के लिए भी उतना ही कष्टदायक है। विशेषज्ञ कहते हैं कि मारने-डाटने से बच्चों में पढ़ाई के प्रति रोष पैदा होता है और मार के डर से उसे जितना भी याद है वो भी भूल जाता है। ऐसे में बच्चों को प्यार से ही पढ़ाने की कोशिश करें।
एक और बात महत्वपूर्ण यह है की प्रतिदिन के पढाई को किसी न किसी माध्यम से खेल से जोड़ने का प्रयास करें | ध्यान रहे की आपके बच्चे वर्ण क के साथ – साथ क से पाँच शब्द भी सीख चुके हैं , उन्हीं पाँच शब्दों को खेल में उतरना है | उदाहरन के लिए – कक्षा में बीस बच्चे हैं तो , पाँच – पाँच बच्चों का समूह बनेगा और हर समूह को एक शब्द दिया जायेगा | जैसे – कटोरी वाले समूह बतायेंगे की वो कटोरी में क्या – क्या खाना पसंद करेंगे | इसी तरह हर समूह अपने – अपने शब्द के बारे में बतायेगा |
सहेजा जा रहा है। हमने अपने बच्चों को एक छोटी उम्र में उन चीज़ों को बचाने के महत्व को समझाया जो वे चाहते थे। हमने गैर-मौद्रिक पाठों का उपयोग करके इसे समझाया। उदाहरण के लिए, हमने थोड़ी देर के लिए टीवी कूपन का इस्तेमाल किया। जब गेविन ने व्यवहार किया, तो उन्होंने टीवी देखने के लिए एक कूपन अर्जित किया। हमने प्रत्येक फिल्म को अपने संग्रह में लंबाई से संबंधित एक संख्या में असाइन किया। शो देखने के लिए उन्हें कई कूपन चाहिए। तो जब वह एक चार कूपन फिल्म द इनक्रेडिबल्स देखना चाहता था, तो उसने उस कूपन पर पकड़ने का फैसला किया जिसे वह पहले से ही उस फिल्म के लिए पर्याप्त कमाई कर रहा था। एक बार यह आदत स्थापित हो जाने के बाद, हमने समझाया कि पैसे बचाने से वैसे ही काम किया जाता है। और हमने उसे अपने पैसे जार में बचाने के लिए एक लिफाफा दिया। आखिरकार, हम उस पैसे को एक बचत खाते में अच्छी ब्याज दर के साथ स्थानांतरित कर देंगे।
हायर एजुकेशन में यह बर्ताव बदलता है। वहां ज्यादा से ज्यादा दोस्ताना बर्ताव करना चाहिए। स्टूडेंट्स को जब लगेगा कि आप उनकी उम्र और भावनाओं को समझने वालों में से एक हैं तो न सिर्फ वे आपके कहने में रहेंगे, बल्कि जो सब्जेक्ट्स आप उन्हें पढ़ाएंगे उसमें उनकी दिलचस्पी भी बढ़ेगी। हालांकि कई बार टीचर्स का दोस्ताना बर्ताव किसी स्टूडेंट में आपको लेकर एक खास किस्म की निजी दिलचस्पी भी पैदा कर सकता है। महिला टीचर को लड़कों से और पुरुष टीचर को लड़कियों से ऐसे अनएक्सपेक्टेट अट्रैक्शन से दो-चार होना पड़ता है। स्टूडेंट्स के मन में ग्रोइंग एज में ऐसा लगाव पैदा होना बहुत स्वाभाविक है। इसलिए आप कोशिश करें कि पूरी क्लास से आपका बर्ताव एक जैसा हो। आमतौर पर इस तरह के आकर्षण जल्दी खत्म हो जाते हैं। इसलिए इन्हें लेकर परेशान होने की जरूरत नहीं।

अगर किताब के ऊपर कोई वीडियो है तो यू-ट्यूब पर सर्च करो और देख लो। किताब तो बाद में पढ़ी जाएगी। यह तरीके कुछ हद तक मदद करते हैं। लेकिन बतौर पाठक किसी किताब को पढ़ने से जो आपकी समझ में बढ़ोत्तरी होती है। शब्द भण्डार संपन्न होता है। आप अपने अनुभवों के लिए शब्द खोज पाते हैं। उदाहरण बनाने और तर्क देने की क्षमता का जो विकास करते हैं, वह केवल दूसरों पर निर्भरता से हासिल नहीं होगा। तो पढ़ने से बचने वाली आदत के कारण खुद से पढ़ने की आदत का विकास बड़ों में नहीं हो पाता है। हालांकि वे सैद्धांतिक तौर पर इस बात को स्वीकार तो करते  हैं और कहते भी हैं कि पढ़ना बहुत जरूरी है।
बच्चे का पूर्ण विकास और स्वास्थ्य कई कारकों को निर्धारित करता है: एक सुव्यवस्थित दैनिक दिनचर्या, एक संतुलित आहार, साथ ही साथ शारीरिक गतिविधि और सकारात्मक भावनाएं। एक नवजात शिशु स्वतंत्र रूप से स्थानांतरित करने में असमर्थ है। इसलिए, मालिश करना इतना आवश्यक है, जो मांसपेशियों और शरीर की अन्य प्रणालियों को मजबूत करने में मदद करता है। अनुदेश 1 निवारक मालिश लगभग हर स्वस्थ बच्चे के लिए संकेत दिया जाता है। यह शरीर के पूर्ण विकास को बढ़ावा देता है। माता-पिता इस मालिश को अपने दम पर कर सकते हैं या पेशेवर मदद ले सकते हैं। आप एक बाल रोग विशेषज्ञ के परामर्श के बाद डेढ़ से दो महीने की उम्र के पहले से ही स्वस्
अक्सर मांएं बच्चों से कहती हैं कि मेरे होते हुए तुम्हें काम करने की क्या जरूरत? बाद में जब बच्चा काम से जी चुराने लगता है तो उसे कामचोर कहने लगती हैं। कई मांएं लड़के-लड़की में भेद करते हुए कहती हैं कि यह काम लड़के नहीं करते, लड़कियां करती हैं। कई बार मांएं सजा के तौर पर काम कराती हैं, मसलन पढ़ नहीं रहे हो तो चलो सफाई करो, किचन में हेल्प करो आदि। बच्चे को लगातार सलाह भी देती रहती हैं, संभलकर गिर जाएगा, टूट जाएगा।
कॉम्पिटिशन के इस दौर में आजकल हर पैरेंट्स चाहते हैं कि उनका बच्चा सबसे तेज बने। इसके लिए वे बच्चे को 2-3 साल में ही प्ले स्कूल में डाल देते हैं। इसके बाद पैरेंट्स की हसरत होती है कि उनका बच्चा जल्द से जल्द लिखना व पढ़ना सीखे। लिखना पढ़ाई की सबसे पहली कड़ी है और जरूरी नहीं कि हर बच्चा आसानी से लिखना सीख जाए। ऐसी स्थिति में कई बार अभिभावक बच्चे पर दबाव भी डालते हैं, लेकिन इसका परिणाम सकारात्मक नहीं आता। आज हम आपको बताएंगे कुछ ऐसे तरीके जिनकी मदद से आप अपने लाडले को लिखना सिखा सकते हैं।
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