बच्चों की गलतियों की ओर ध्यान खींचने जितना ही अहम है उसकी अच्छाइयों की ओर लगातार ध्यान दिलाना। इससे बच्चे भटकेंगे नहीं। जहां कहीं भटकाव दिखे, उसे वहीं मार्क करना और बच्चों को सही रास्ते पर लाने के लिए टीचर को समझदारी से वापसी के उन रास्तों को तलाशना चाहिए जिससे बच्चे फिर से राह पर आ सकें। मिसाल के तौर पर, एक टीचर ने जब किसी लड़के को लड़कियों में जरूरत से ज्यादा दिलचस्पी लेते देखा तो वह खुद उसके पास गए और कहा कि मैं तुम्हारे घरवालों से बात करूंगा कि वे तुम्हारी शादी कर दें। यहां आकर पैसा और वक्त बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। लड़का घबरा गया। इसके बाद टीचर ने उसे समझाया कि तुम्हारी उम्र में पढ़ाई सबसे जरूरी है। इन कामों का वक्त अभी नहीं आया है। लड़के ने पढ़ाई में मन लगाना शुरू कर दिया।
सरकारी स्कूलों में बच्चों का रुझान पढ़ाई की ओर बढ़े, इसके लिए सूक्ष्म नवाचार (माइक्रो इनोवेशन) के माध्यम से प्रदेश के छह जि़लों में बच्चों को पढ़ाने की तैयारी है। बेसिक शिक्षा विभाग ने सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को रोचक ढंग से बच्चों को पढ़ाने की योजना बनाई है। एससीईआरटी (स्टेट काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग) ने एनजीओ एसटीआईआर (स्कूल टीचर इनोवेशन एंड रिसर्च) के माध्यम से इस कार्यक्रम को शुरू किया है। प्रदेश के छह जिलों लखनऊ, उन्नाव, कानपुर, रायबरेली, बनारस, जौनपुर और फैजाबाद में सभी ब्लॉकों पर दो दिन का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। 
आस पास रखें किताबें: अगर आप कामकाजी महिला है तो ऐसे में आपके बच्चे के पास दिनभर किताब नहीं रह सकती है और वह सिर्फ रात में ही सोते समय किताबें पढ़ सकता है। जबकि यह ज़रूरी है कि बच्चे का जब किताबों से खेलने या उन्हें पढने का मन करे तो वह उसके आस पास होनी चाहिए। इसलिए बच्चे की पहुँच में कुछ उसके लायक किताबें घर में ज़रूर रखें जिसे वो खुद कभी भी निकाल कर पढ़ सके।

Mujhe iss bat se bilkul hi koi problem nahi na kisi aur sikshak ko. Jo prakria is dhang me bataya gaya wah bilkul satik aur productive hai. Main iska istemal bakhoobi karata gun. Khed hai Ki shikshak jinhen rashtra dharohar ko sawarane ka jimma shaupa gaya hai as I NATO men ruchi Lyon nahi lete. Asi negativity samaj ke liye hitkar nahi hai.sadhanyabad.
- सरकारी स्कूल में पढ़ाना किसी चुनौती से कम नहीं होता। उसमें स्टूडेंट खासे बिगड़ैल होते हैं। एक बार एक स्टूडेंट ने स्कूल से बाहर एक छात्रा को परेशान किया। उसे पुलिस पकड़ कर स्कूल ले आई, लेकिन स्कूल टीचर्स ने उस स्टूडेंट को पुलिस से बचाया। ऐसा करके उसे सिर्फ यह बताया गया कि हम तुम्हारी गलती पर पर्दा नहीं डाल रहे, बल्कि तुम्हें यह बता रहे कि जो शरारत तुमने की थी, उसकी सजा गंभीर भी हो सकती है। इस घटना के बाद उस स्टूडेंट ने कभी ऐसी हरकत नहीं की। गलती का अहसास होने पर ही स्टूडेंट बदलता है, मारने- पीटने से फायदा नहीं होता। इसके अलावा अगर स्टूडेंट अपनी आदतों में सुधार न करें तो उसके पैरंट्स को जरूर बताना चाहिए। कई बार देखने में आता है कि पैरंट्स को बुलाने की बात जब सामने आती है तो स्टूडेंट अपनी आदतों में बदलाव लाता है।

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खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय मोरनी में 50 प्राथमिक शिक्षकों के लिए एक वर्कशॉप का आयोजन किया गया। एससीईआरटी गुड़गांंव के निर्देश से डाईट की प्रिंसिपल सुजाता राणा के मार्गदर्शन में यह वर्कशॉप हुई। इसमें अध्यापकों को लर्निंग आउटकमज पर पांच दिन तक प्रशिक्षण दिया गया। इसमें बताया गया कि विद्यार्थियों को कैसे कक्षा में रखा जाए, उन्हें किस प्रकार एक्टिविटी बेस लर्निंग कराई जाए। ताकि वह पूरे उत्साह व रोमांच से कक्षा के शिक्षण कार्यों में भाग ले सके।
जब भी कोई अहिंदी भाषी हिंदी बोलेगा तो उसकी बोली मे मातृभाषा का पुट अक्सर आ ही जाता है. इसी का असर है कि गणेश, कणेश हो जाते हैं खाना, काना हो जाता है और स्कूल, सकूल हो जाते हैं.. शिक्षकों को इनका ध्यान रखना चाहिए और खास जोर देकर ऐसी त्रुटियों का निवारण करना चाहिए. यदि छोटे वय में ऐसा न किया गया, तो बड़े वय में ऐसा करना बहुत ही मुश्किल है. कभी कभी यह असंभव भी हो जाता है - क्योंकि छोटी उम्र में सिखाने के तरीके बड़ी उम्र में अपनाए नहीं जा सकते. यह केवल हिंदी के साथ ही नहीं है. अंग्रेजी का एगेन्स्ट (Against) तेलुगु भाषी के लिए अगेनस्ट हो जाता है. वैसे ही ब्रिज (Bridge) , ब्रिड्ज हो जाता है. खैर इसमें अंग्रेजी के उच्चारण - लुप्तता का असर साफ दिखता है किंतु भारतीय भाषाओँ की खासियत है कि किसी भी वर्ण का उच्चारण लुप्त नहीं होता. यहाँ यह अंग्रेजी से बहुत बेहतर है. उच्चारण की बहुत सी खामियाँ टल जाती हैं. ऐसा नहीं है कि इनके कारण केवल नुकसान ही होता है. ऐसी आदतों के कारण ही दक्षिण भारतीय अच्छे स्टेनोग्राफर साबित हुए हैं. स्टेनोग्राफी एक उच्चारण आधारित लिपि है इसलिए उससे कोई भी भाषा लिखी जा सकती है. यदि भाषा का ज्ञान हो तो आसानी से पुनः लॉन्ग हैंड में भी   सही - सही प्रस्तुत किया जा सकता है.
घर में दादा-दादी जब बच्चों को शिक्षाप्रद कहानियां सुनाते हैं, तो वह उनके अवचेतन मन में चली जाती है। इससे उनमें जीतने का जज्बा, संघर्ष का एहसास, हार न मानना ऐसी कई बातें आ जाती हैं। समूह में रहना, मां-पिता तथा बुजुर्गों का सम्मान करना, ऐसी बातें भी वे अच्छी तरह समझने लगते हैं। यानी कहानियां बच्चों को भावनात्मक संबल देती हैं। इसलिए उनको छोटी-छोटी, लेकिन शिक्षाप्रद कहानियों से जोड़ने की कोशिश करें।

एक दशक पहले, बच्चों को रजिस्ट्री कार्यालय में अपने माता-पिता के पासपोर्ट में अनिवार्य रूप से दर्ज किया गया था, जहां उन्होंने पहले बच्चों के दस्तावेज - एक जन्म प्रमाण पत्र जारी किया था। अब, ऐसा करने के लिए, आपको जिले के पासपोर्ट कार्यालय में जाना होगा, भले ही आप अपने रूसी या अंतर्राष्ट्रीय पासपोर्ट में बच्चे को दर्ज करना चाहते हों। अनुदेश 1 पासपोर्ट में बच्चे को दर्ज करने के लिए, आपके पास निम्नलिखित दस्तावेज होने चाहिए: आपका रूसी पासपोर्ट, पासपोर्ट और बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र। आपको दो प्रतियों में पासपोर्ट में एक बच्चे के पंजीकरण के लिए एक आवेदन भी भरना होगा। दस्तावेजों के इस पैकेज के आधार पर,

अंततः बात बग़ैर किसी निष्कर्ष के जारी रही। कुछ शिक्षक साथियों ने कहा कि तीसरी कक्षा के बच्चों को उन्होंने बारह खड़ी की मदद से पढ़ना सिखाया क्योंकि उनको सिखाने के लिए हमारे पास ज्यादा समय नहीं है। मगर एक बात पर सारे लोग सहमत थे कि पहली-दूसरी को हिंदी पढ़ना सिखाने के लिए पर्याप्त समय देना चाहिए। उनके साथ नियमित काम होना चाहिए। इसके साथ ही सिखाने का तरीका ऐसा होना चाहिए कि बच्चों को उससे सीखने में आसानी हो और हमें भी ऐसा न लगे कि हम पर चीज़ें थोपी जा रही है। शिक्षकों का प्वाइंट काफी दमदार लगा मुझे।

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