लेकिन हर माता – पिता की यही इच्छा होती है की उनका बच्चा समाज में प्रतिष्ठा, प्रंशसा एवं लोकप्रियता हासिल करें | इसके लिए वह अपने बच्चे का अपने हैसियत से बढ़कर अच्छे से अच्छे स्कूल में एडमिशन कराते है ताकि वह नैतिक शिक्षा को ग्रहण कर नैतिक मूल्यों का विकास कर सके | लेकिन स्कूली शिक्षा के साथ – साथ बच्चों में नैतिक गुणों का विकास करने में माता – पिता एवं परिवार के अन्य सदस्यों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है |
छोटे बच्चों को अक्सर पेट खराब होता है। दस्त के कारण बहुत भिन्न हो सकते हैं, आपको गंभीर बीमारियों से अपेक्षाकृत सुरक्षित, आसानी से ठीक होने वाले पाचन विकारों में भेद करने में सक्षम होने की आवश्यकता होती है, जिन्हें तत्काल चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है। शिशुओं में मल की आवृत्ति काफी एक व्यक्तिगत संकेतक है। कुछ शिशुओं के लिए और प्रति दिन लगभग दस मल त्याग सामान्य माना जाता है। 2-3 दिनों के लिए कुर्सी की देरी भी हमेशा एक गंभीर बीमारी का संकेत नहीं है। शिशुओं में दस्त के मुख्य लक्षण निम्नानुसार हैं: बच्चा अचानक डायपर को अधिक बार मिट्टी देना शुरू कर देता है, मल की स्थिरता एक तरल और पानी वाले में

जब भी कोई अहिंदी भाषी हिंदी बोलेगा तो उसकी बोली मे मातृभाषा का पुट अक्सर आ ही जाता है. इसी का असर है कि गणेश, कणेश हो जाते हैं खाना, काना हो जाता है और स्कूल, सकूल हो जाते हैं.. शिक्षकों को इनका ध्यान रखना चाहिए और खास जोर देकर ऐसी त्रुटियों का निवारण करना चाहिए. यदि छोटे वय में ऐसा न किया गया, तो बड़े वय में ऐसा करना बहुत ही मुश्किल है. कभी कभी यह असंभव भी हो जाता है - क्योंकि छोटी उम्र में सिखाने के तरीके बड़ी उम्र में अपनाए नहीं जा सकते. यह केवल हिंदी के साथ ही नहीं है. अंग्रेजी का एगेन्स्ट (Against) तेलुगु भाषी के लिए अगेनस्ट हो जाता है. वैसे ही ब्रिज (Bridge) , ब्रिड्ज हो जाता है. खैर इसमें अंग्रेजी के उच्चारण - लुप्तता का असर साफ दिखता है किंतु भारतीय भाषाओँ की खासियत है कि किसी भी वर्ण का उच्चारण लुप्त नहीं होता. यहाँ यह अंग्रेजी से बहुत बेहतर है. उच्चारण की बहुत सी खामियाँ टल जाती हैं. ऐसा नहीं है कि इनके कारण केवल नुकसान ही होता है. ऐसी आदतों के कारण ही दक्षिण भारतीय अच्छे स्टेनोग्राफर साबित हुए हैं. स्टेनोग्राफी एक उच्चारण आधारित लिपि है इसलिए उससे कोई भी भाषा लिखी जा सकती है. यदि भाषा का ज्ञान हो तो आसानी से पुनः लॉन्ग हैंड में भी   सही - सही प्रस्तुत किया जा सकता है.
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- छठी क्लास की एक लड़की को उसका भाई फिजिकली अब्यूज कर रहा था। लड़की को हमेशा गुम-सुम देखकर टीचर ने उससे पूछा। पहले वह कुछ नहीं बोली। बाद में टीचर के लगातार यह विश्वास दिलाने पर कि तुम्हारा सीक्रेट मेरा सीक्रेट है और कोई तुम पर नहीं हंसेगा, लड़की ने धीरे-धीरे सारी बात बताई। टीचर ने लड़की के पैरंट्स से कॉन्टैट किया और भाई के खिलाफ केस भी कराया। लेकिन, इस कामयाबी में और लड़की का भरोसा जीतने में टीचर को महीनों मेहनत करनी पड़ी।
 • Decisive: जब हम अपने घर से दूर होते हैं हमारे रोज़मर्रा के जीवन से जुड़े छोटे छोटे फैसले लेने में सहयोगी साबित होता है हमारे घर से हमारा दूर रहना। क्या चीज़ का सही दाम कितना है और पैसों की अहमियत झट से समझ आ जाती है जो कभी घर पर समझ नहीं आयी थी। महँगे कपड़ों की जिद्द करना भूल गयी मैं,हॉस्टल से जाने के बाद। पतिदेव भी decisive हैं,लेकिन केवल कुछ मुद्दों में। बाकी हमारी सासु माँ से एक बार डिसकस किये बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता चाहे वो घर में कोई सामान लाने की बात ही क्यों ना हो।
जब किसी किताब को पढ़ने बैठें तो उसे सरसरी निगाह से देखें। पुस्तक के लेखक-चित्रकार, प्रकाशन, मूल्य और किताब के प्रमुख चैप्टर और उसके शीर्षक को देखें फिर उसे विस्तार से पढ़ें। अपने काम से जुड़ी सामग्री को पढ़ना और वहाँ से मिलने वाले विचारों को जमीनी स्तर पर लागू करने की आदत आपको एक बेहतर क्रियान्वयन वाले लीडर के रूप में स्थापित कर सकती है। तो फिर लगातार पढ़ते रहिए, जीवन में नये विचारों को इस खिड़की से ताजी हवा के झोंकों की तरह आने दीजिए।

टीचर को बच्चों से बेहद संजीदगी से बात करनी चाहिए। इससे बच्चे अनुशासित रहते हैं और उनमें आज्ञाकारिता बनी रहती है। बच्चों को हमेशा यह अहसास दिलाना जरूरी है कि उनकी शरारतों की जगह स्कूल नहीं है। उन्हें यह भी बताते रहना चाहिए कि उनके हिस्से का काम क्या है और कहां उन्होंने लिमिट क्रॉस की है। लेकिन ऐसा करते हुए बच्चे को मारने या बुरी तरह डांटने से बचना चाहिए। मार या तेज डांट से उसकी सायकॉलजी पर बुरा असर पड़ता है। टीचर को अपने इमोशंस और गुस्से पर कंट्रोल रखना आना चाहिए।
परन्तु मेरा अनुभव यह भी कहता है – बच्चे को किसी भी वर्ण या मात्रा से परिचय कराने से पूर्व, उस वर्ण या मात्रा का कम से कम पाँच – पाँच शब्दों को सचित्र दोस्ती करवाया जाय | ऐसा करने से बच्चा सरलता और सहजता से याद तो करेगा ही साथ ही उसका शब्द भंडार भी बढ़ेगा | उदाहरन के लिए – क सिखाने से पहले बच्चों को चित्र के साथ घरेलू वस्तुयों से परिचय करवाएं – कटोरी , कडाही , कलछुल , कद्दू ,कलम , यह सारे शब्द ऐसे हैं जिन्हें बच्चा अपने घर में प्रतिदिन देखता है |
शिक्षकों को तीनों विषयों की पढ़ाई में कमजोर बच्चों को आसान तरीकों से बच्चों का ज्ञान बढ़ाने के लिए कहा गया है। इस दौरान बच्चों को पढ़ाने के लिए विभाग की ओर से अलग स्टडी मैटीरियल भी तैयार किया गया है, जिसे सभी स्कूलों में भेज दिया गया है। इसमें गणित, विज्ञान और अंग्रेजी को रोचक बनाया गया है। एक्स्ट्रा लर्निंग मैटीरियल चित्रों पर आधारित है ताकि बच्चे खेल-खेल में तीनों विषयों के बारे में पूरा ज्ञान प्राप्त कर सकें। जिस विषय में अधिक बच्चे पिछड़ रहे हैं वहा विशेषज्ञ शिक्षकों की मदद भी ली जाएगी। सर्वशिक्षा अभियान के तहत प्रशिक्षण देने वाले प्रशिक्षकों से भी इस योजना के तहत सहयोग लिया जाएगा। एक्स्ट्रा क्लास समाप्त होने के बाद इन बच्चों का मूल्याकन भी करवाया जाएगा और बौद्धिक क्षमता यदि कक्षा के अनुरूप न हुआ तो फिर से यही प्रक्रिया दोहराई जाएगी।
शबनम के बेटे को बुलंदशहर के रहने वाले पत्रकार उस्मान सैफी और उनकी पत्नी वंदना ने गोद ले लिया था। अमरोहा की बाल कल्याण समिति वहां जाकर उनके बच्चे का हाल-चाल लेती है। उस्मान ने कहा कि एक बार उसने शबनम और सलीम की तस्वीर देखी तो पूछा कि मां के साथ कौन है। उन्होंने उससे कहा कि वह उसके अंकल है। उन्होंने बताया कि वे लोग बच्चे के कुछ नहीं बताते हैं लेकिन पता नहीं कब तक सच छिपा पाएंगे।
हम अक्सर बच्चों में पढ़ने की आदत का विकास करने के बारे में सुनते हैं। इस बारे में चर्चा भी होती है। लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर ग़ौर किया है कि जबतक माता-पिता, अभिभावक, शिक्षक खुद अपने पढ़ने की आदत का विकास नहीं करते, बच्चों को केवल कहने उनमें पढ़ने की ललक का विकास नहीं होगा। इस बात ने इस मुद्दे पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि बड़ों में पढ़ने की आदत का वर्तमान ट्रेंड क्या है और कौन-कौन से कारण हैं जिसके कारण वे पढ़ने की आदत डालने में परेशानी महसूस करते हैं। बड़े चाहते हैं कि बच्चे पढ़ें, लेकिन वे खुद बच्चों को पढ़ते हुए नज़र नहीं आते। ऐसे में बच्चों पर उनकी कही हुई बातों का भी बहुत ज्यादा असर नहीं होता है।
छोटे बच्चों को अक्सर पेट खराब होता है। दस्त के कारण बहुत भिन्न हो सकते हैं, आपको गंभीर बीमारियों से अपेक्षाकृत सुरक्षित, आसानी से ठीक होने वाले पाचन विकारों में भेद करने में सक्षम होने की आवश्यकता होती है, जिन्हें तत्काल चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है। शिशुओं में मल की आवृत्ति काफी एक व्यक्तिगत संकेतक है। कुछ शिशुओं के लिए और प्रति दिन लगभग दस मल त्याग सामान्य माना जाता है। 2-3 दिनों के लिए कुर्सी की देरी भी हमेशा एक गंभीर बीमारी का संकेत नहीं है। शिशुओं में दस्त के मुख्य लक्षण निम्नानुसार हैं: बच्चा अचानक डायपर को अधिक बार मिट्टी देना शुरू कर देता है, मल की स्थिरता एक तरल और पानी वाले में
एक सप्ताह के बाद मैं जेक से मिलने गई कि वो कैसे रह रहा है। उसने काफी अच्छा डिनर का आयोजन कर रखा था। हमने अपने अपने सपनों के बारे में बताया। खाने के बाद डिजर्ट के साथ साथ उसने कुछ मेरे हाथों में रखा ।मैंने नीचे देखा तो मेरे हथेली पर चाभियां रखी थी । उसने मेरे कानों में कहा “जेस ये तुम्हारा है, मैं तुम पर शिफ्ट करने का किसी तरह का दवाब नहीं बना रहा हूं लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम्हें पता हो कि ये जगह तुम्हारा भी है। मुझे इस बात की बेहद खुशी है।“
हर मा बाप अपने बच्चो से दिलो जानसे प्यार करते है और हर मा बाप अपने बच्चे को पढ़ाई में होशियार होते हुए देखना चाहते है । इसलिए हर मा बाप को अपने बच्चों को सबसे पहले पढ़ना सीखना ही होगा। इसके लिए जब आपका बच्चा छोटा होता है तो आप अपने बच्चे के सामने किसी बुक को जोर से पढ़े ताकि उसके दिल मे आपके जैसे पढ़ने की उत्सुकता बन जाएं। इसके अलावा भी अपने बच्चों को पढ़ना सिखाने के लिए हम आपके लिए बढिया तरीके लाये है जिन्हें आजमाकर आप आसानी से अपने बच्चो को पढ़ना सीखा सकते है।

लेकिन क्या होगा अगर बच्चे की समस्याएं शारीरिक पर नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक स्तर पर हों? आखिरकार, यह स्थिति के विकास के मुद्दे पर बहुत सावधानीपूर्वक दृष्टिकोण करने के लायक है, ताकि स्थिति को और भी अधिक न बढ़ाया जा सके। उदाहरण के लिए, बच्चे के पास एक छोटी शब्दावली है और बोलने से इनकार करता है। ऐसा करने के लिए, आपको उसकी उंगलियों के साथ अभ्यास करने की ज़रूरत है, उसे छोटे खिलौने खेलने के लिए देने के लिए, खिलौने के अधिक सटीक हिस्से, सुरक्षा की दृष्टि से तय किए गए हैं। उंगलियों के आंदोलन अभ्यास बच्चे के भाषण केंद्रों के स्थिरीकरण और विकास में योगदान करते हैं। यह बच्चे की "निष्क्रिय" शब्दावली का भी ध्यान रखने योग्य है। शायद वह सिर्फ बात करना नहीं चाहता है, लेकिन वह सुनता है। जितने अधिक शब्द माँ और पिताजी बोलते हैं, उतना ही आपका बच्चा उन्हें संचित करता है। और मुख्य गलती न करें - इसके लिए खुद न बोलें। बच्चा यहां तक ​​कि बात नहीं कर सकता क्योंकि वह इसके लिए कोई ज़रूरत नहीं देखता है, क्योंकि माँ उसके लिए कहेगी कि वह क्या चाहता है, उसके लिए सब कुछ करें, आदि।

4 मत्ती 28:19, 20 पढ़िए। बाइबल में बपतिस्मा लेने की कोई उम्र नहीं दी गयी है। लेकिन माता-पिताओं को मत्ती 28:19 में दी बात पर गौर करना चाहिए। वहाँ यीशु ने आज्ञा दी कि लोगों को मेरा “चेला बनना सिखाओ।” इससे पता चलता है कि एक व्यक्‍ति को पहले सिखाया जाना ज़रूरी है, तभी वह शिष्य या चेला बन सकता है। चेला उसे कहते हैं जो यीशु की शिक्षाओं को सीखता है, उन्हें समझता है और उन पर चलना चाहता है। इसलिए माता-पिताओं का यह लक्ष्य होना चाहिए कि वे अपने बच्चों को छुटपन से ही सिखाएँ ताकि वे यहोवा को अपना जीवन समर्पित कर सकें और मसीह के चेले बन सकें। बेशक दूध-पीते बच्चे बपतिस्मा लेने के योग्य नहीं होते। मगर बाइबल बताती है कि छोटे बच्चे भी बाइबल की सच्चाइयाँ समझ सकते हैं।
अगर किताब के ऊपर कोई वीडियो है तो यू-ट्यूब पर सर्च करो और देख लो। किताब तो बाद में पढ़ी जाएगी। यह तरीके कुछ हद तक मदद करते हैं। लेकिन बतौर पाठक किसी किताब को पढ़ने से जो आपकी समझ में बढ़ोत्तरी होती है। शब्द भण्डार संपन्न होता है। आप अपने अनुभवों के लिए शब्द खोज पाते हैं। उदाहरण बनाने और तर्क देने की क्षमता का जो विकास करते हैं, वह केवल दूसरों पर निर्भरता से हासिल नहीं होगा। तो पढ़ने से बचने वाली आदत के कारण खुद से पढ़ने की आदत का विकास बड़ों में नहीं हो पाता है। हालांकि वे सैद्धांतिक तौर पर इस बात को स्वीकार तो करते  हैं और कहते भी हैं कि पढ़ना बहुत जरूरी है।
दूसरी बात कि कुछ स्कूलों में मात्रा सिखाने का तरीका भी समस्याओं से ग्रस्त है, जिससे निजात पाने की जरूरत है। ताकि बच्चों को एक बोझिल कवायद से बचाया जा सके। जैसे किताब पढ़ने के लिए क, क पर बड़ी ई की मात्रा की, त, त पर आ की मात्रा ता, ब किताब। इस तरीके से किसी पाठ को पूरे प्रवाह और सहजता के साथ पढ़ने में बच्चों को दिक्कत होती है। लंबे-लंबे वाक्यों को पढ़ना तो बहुत परेशान करने वाला होता है।

किसी वर्ण के साथ मात्रा लगने पर उसकी आवाज़ में बदलाव होता है, अगर इस बात को समझने का मौका बच्चों को मिले तो वे बहुत आसानी से मात्राओं के कांसेप्ट को समझ सकते हैं। उदाहरण के लिए इसके लिए जिन वर्णों को बच्चे पहले से जान रहे थे, उसमें ‘ई’ की मात्रा लगाने के बाद बच्चों को पढ़कर बताया कि उसकी आवाज़ कैसे बदल रही है। (जैसे क+ी=की, र+ ी= री)। इसके बाद वर्णों और मात्रा लगे वर्णों को लिखना शुरु किया, इसके जरिए बच्चों को यह बताना था कि कौन सा वर्ण लिखा जा रहा है। या मात्रा लगे वर्णों को पढ़कर बताने का मौका बच्चों को मिले।


इससे पहले कि माता-पिता अपने एक साल के बच्चे को विकसित करना शुरू करने का फैसला करें, उन्हें बस यह जानने की जरूरत है कि उनका बच्चा इस उम्र तक क्या कर सकता है, जानना और करना चाहिए। सबसे पहले, आपको इसके शारीरिक विकास पर ध्यान देने की आवश्यकता है, जो शिशु के निम्नलिखित कौशल में व्यक्त किया गया है: सहायता के बिना, पैरों पर खड़े रहना, दौड़ना (तीसरे पक्ष की मदद का उपयोग करना), स्वतंत्र रूप से चलना, वयस्कों की नकल करना, उनके कुछ कार्यों की नकल करना, एक कप से पीना वयस्कों की मदद के बिना।

रॉबर्ट कभी भी इन सब चीजों को चेक करने नहीं जाता है। इसलिए मुझे पता था कि मुझे अपनी किसी भी दोस्त को ये सब बताने की जरूरत नहीं है। जब भी मुझे रॉबर्ट स्माइल कर देखता था या बाहों में लेता था ,मैं खुद को अपराधी समझने लगती थी और तुरंत उसके साथ बेड पर चली जाती थी। हम दोनों तब किसी जंगली जानवर से कम नहीं होते थे। मैं अपराधबोध में तो रॉबर्ट अपनी पत्नी के साथ आनंदित होता था ।
जैसे-जैसे बच्चा बड़े हो जाता है, उसे यह अनुमान लगाने के लिए कहें कि अब इस  कहानी में क्या होगा। उन्हें यह भी अनुमान लगाने के लिए कहें कि कहानी में एक विशेष कैरेक्टर एक विशेष तरीके से व्यवहार क्यों करती है। अगर ये प्रश्न कहानी के प्रवाह को तोड़ने लगते हैं तो चिंता मत करो। क्योंकि बच्चो को कहानी में दिलचस्पी लाने के लिए उन्हें अनुमान पूछना इंटरेस्टेड होता है।
मेरे इस चैंनल #Only_For_Kids में आपको बच्चों की शिक्षा और Parenting Tips के सम्बंध में बहुत सारी video उपलब्ध कराई गई है जैसे - बच्चों को पढ़ाने का सही तरीका हिंदी वर्णमाला english alphabet a to z बच्चों को लिखना कैसे सिखाएँ इसके अलावा बच्चों के personality devlopment के सम्बंध में भी बहुत सारे नए-नए एक्टिविटी बताई जाती है। बहुत से पेरेंट्स कॉमेंट्स करते हैं कि मेरा बच्चा होमवर्क नहीं करता मेरा बच्चा पढ़ता नहीं है हिंदी इंग्लिश लिखना और पढ़ना सिखाओ बच्चा बहुत जिद्दी है जिद्दी बच्चे को समझाने का सही तरीका क्या होता है तो ऐसे बहुत सारे प्रश्नों का उत्तर आपको मेरे videos में मिल जाएगा क्योंकिं मैं एक primary school का टीचर हूँ और मैं रोज अलग अलग प्रकार के बच्चों के बीच मे रहता हूँ जैसे जिद्दी बच्चे होशियार बच्चे सामान्य बच्चे पढ़ाई में कमजोर बच्चे लेकिन उन सभी के लिए मैं कुछ न कुछ नए ट्रिक्स लाते रहता हूँ और पढ़ाई को रोचक बनाता हूँ जिससे वो अच्छे से पढ़ते हैं और बात भी सुनते हैं। बच्चों को जोड़ना घटाना गुना भाग सीखने के भी नए नए तरीके है जिन्हें मैं अपने video के माध्यम से आपको हमेशा सिखाते रहूँगा यदि आप भी चाहते है आपको अच्छे अच्छे बच्चों की कहानी बच्चों की पोएम कविता सुनने देखने को मिले तो ये चैंनल आपके लिए ही है। आप सभी का धन्यवाद😊🙏
इस वर्ण संरचना के बाद हिंदी के एक वर्ण के लिए, अंग्रेजी की एक तरह की ही वर्ण संरचना होगी और किसी प्रकार का संशय नहीं रह जाएगा. हालाँकि यह काफी कठिन है. हमारे पूर्व राष्ट्रपति  व विशिव प्रसिद्ध दार्शनिक डॉ. सर्वेपल्लि राधाकृष्णन की अंग्रेजी में लिखी गई श्रीमद्भगवत्गीता में हिंदी उच्चारणों के जो संकेत दिए हैं, वे सटीक हैं. किसी कम्प्यूटर या टाईपराईटर पर, वैसे संकेत मैंने तो आज तक नहीं देखा.
आदरणीय, नमस्कार! मैंने मातृ भाषाओं के हक़ में एक दस्तावेज लिखा है जो हिंदी, पंजाबी, डोगरी, तामिल, तेलुगु, कन्नड़, मैथिलि, उर्दु, और अंग्रेजी भाषाओं में उपलब्ध है. इस दस्तावेज का नाम 'भाषा नीति के बारे में अंतरराष्ट्रीय खोज: मातृ भाषा खोलती है शिक्षा, ज्ञान और अंग्रेजी सीखने के दरवाज़े' है. आप इसे हिंदी, पंजाबी, मैथिली, तामिळ, तेलुगू, कन्नड़, उर्दू, और अंग्रेजी में http://punjabiuniversity.academia.edu/JogaSingh/papers अंतरजाल पते से पढ़ सकते हैं. पीडीएफ प्रति चाहें तो मुझे अपना विद्युत पता भेज कर मंगवा सकते हैं. कुछ प्रतियां संलगित हैं. इस दस्तावेज में भाषा के मामलों सम्बन्धी दुनिया भर की खोज, समझ और व्यवहार का सार दिया गया है और दिखाया गया है कि मातृ भाषाओं की अनदेखी से भारत को कितने ज़्यादा शैक्षिक, विकासपरक और वाणिज्यपरक नुकसान हो चुके हैं और हो रहे हैं. उपरोक्त पते पर भाषा सम्बन्धी कुछ और लेख भी पड़े हैं. कोई दस्तावेज अच्छा लगे तो आगे बांटियेगा. सधन्यवाद!,
दोस्तों आपको पता तो है ही कि जमाना इतना आगे बढ़ चूका है और आजकल बच्चे ढाई साल की उम्र से ही school जाना शुरू कर देते है. ऐसे में उनपर burden बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और parents की expectation बच्चो से और बह ज्यादा बढ़ जाती है. लेकिन क्या आपको बच्चो को पढ़ाने का तरीका मालूम है ? बहुत सारे parents अपने बच्चों को पढ़ाने के बारे में सोचते होंगे कि कैसे पढ़ाया जाये ?
दोस्तों आपको पता तो है ही कि जमाना इतना आगे बढ़ चूका है और आजकल बच्चे ढाई साल की उम्र से ही school जाना शुरू कर देते है. ऐसे में उनपर burden बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और parents की expectation बच्चो से और बह ज्यादा बढ़ जाती है. लेकिन क्या आपको बच्चो को पढ़ाने का तरीका मालूम है ? बहुत सारे parents अपने बच्चों को पढ़ाने के बारे में सोचते होंगे कि कैसे पढ़ाया जाये ?
Mujhe iss bat se bilkul hi koi problem nahi na hi kisi aur sikshak ko hoga. Jo prakria iss dhang men bataya gaya hai wah bilkul satik aur productive hai. Main iska istemal bakhoobi karata hun. Khed hai Ki shikshak jinhen rashtra dharohar ko sawarane ka jimma shaupa gaya hai aisi baton men ruchi kyon nahi lete. Aisi negativity samaj ke liye hitkar nahi hai.Sadhanyabad.
कई पैरेंट्स में पेशंस की बहुत कमी होती है। बच्चे ने अगर एक बार कुछ याद न किया तो उन्हें जबरदस्ती डांट फटकार लगाकर या कभी-कभी तो याद कराने के लिए उन पर जोर देते हैं और जरूरत पड़ने पर उन पर हाथ तक उठा देते हैं। ऐसा करना न केवल आपके लिए नुकसानदायक है बल्कि आपके बच्चे के लिए भी उतना ही कष्टदायक है। विशेषज्ञ कहते हैं कि मारने-डाटने से बच्चों में पढ़ाई के प्रति रोष पैदा होता है और मार के डर से उसे जितना भी याद है वो भी भूल जाता है। ऐसे में बच्चों को प्यार से ही पढ़ाने की कोशिश करें।
‘स्पाइसटून्स’ इस मंच को बच्चों के लिये निःशुल्क रखना चाहता है। इन्हें उम्मीद है कि इसकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर किताबों और अन्य सामान के विक्रेता ‘स्पाइसटून्स’ का इस्तेमाल अपने विज्ञापन के लिये करेंगे जिससे इन्हें राजस्व की प्राप्ती होगी। प्रयोगकर्ताओं के सकारात्मक अनुभव ने इन्हें रिलीज के चार सप्ताह के भीतर ही प्रतिष्ठित फिक्की बीएएफ अवार्ड का विजेता चुने जाने में मदद की।

भाषा कालांश के अपने अनुभवों में भी मैंने इस बात को देखा है कि जो बच्चे बारहखड़ी के माध्यम से किसी लिखित सामग्री को पढ़ने की कोशिश करते हैं, उनकी रफ्तार बाकी बच्चों से कम होती है जो मात्रा को समझकर पढ़ते हैं। एक बच्चे को प्रवाह के साथ किताब पढ़ने वाली स्थिति तक पहुंचने के लिए कई महीनों जूझना पड़ा। इसके लिए पुस्तकालय की किताबों से काफी मदद मिली। अगर इस तरह का सपोर्ट नहीं होता तो बच्चे के लिए अटक-अटक कर पढ़ने वाली स्थिति से बाहर निकलना काफी मुश्किल हो जाता।
हर पेरेंट्स यही चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़ लिख कर अपने लाइफ में बहुत सफल बनें। लेकिन यह काफी हद तक आपकी परवरिश पर भी निर्भर करता है कि आप अपने बच्चे के पालन पोषण पर कितनी गंभीरता से ध्यान देते हैं और उसे एक बेहतर इंसान बनाने में कैसे मदद करते हैं। कई माँ बाप इस बात को लेकर बहुत परेशान रहते हैं कि वे अपने बच्चों में किताबें पढने की आदत कैसे डालें क्योंकि किसी को बेहतर इंसान और सफल बनाने में किताबों का अहम रोल है। बचपन से ही किताबे पढने से न सिर्फ बच्चे का दिमाग तेज होगा बल्कि  उसकी सोचने समझने की क्षमता भी बेहतर होने लगती है। ऐसा माना जाता है कि छोटे बच्चे सबसे ज्यादा अपनी मां के करीब होते हैं और सबसे ज्यादा चीजें वे उनसे ही सीखते हैं। इसलिए यह ज़रूरी हो जाता है कि आप खुद भी किताबें पढने की आदत डालें। आइये जानते हैं ऐसे ही कुछ टिप्स जिसकी मदद से आप बच्चे में किताब पढने की आदत डाल सकती हैं।
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