10 कुछ माता-पिता सोचते हैं कि पहले उनके बच्चे को और भी पढ़ाई कर लेनी चाहिए और अच्छा करियर बनाना चाहिए, इसके बाद ही वह बपतिस्मा ले सकता है। शायद वे नेक इरादे से ऐसा सोचें, लेकिन उन्हें खुद से पूछना चाहिए, ‘क्या इन बातों से वाकई मेरे बच्चे को सच्ची कामयाबी मिलेगी? क्या यह सोच बाइबल की सोच से मेल खाती है? यहोवा क्या चाहता है कि हम अपनी ज़िंदगी कैसे जीएँ?’​—सभोपदेशक 12:1 पढ़िए।
ऐसा भी कहा जाता है कि बच्चों को रटाना नहीं है। इसलिए हम उसे अक्षर नहीं सिखाते। क्योंकि यह तरीका तो रटंत पद्धति पर आधारित है। वहीं मात्रा शिक्षण के बारे में धारणा है कि बच्चा उसे भी सीधे शब्द की तरह अपने आप पढ़ना सीख लेगा। मगर कैसे? इस सवाल का किसी के पास कोई जवाब नहीं है। इसी संदर्भ में असेसमेंट की बात हो रही थी कि हम जिन पैमानों पर बच्चों का असेसमेंट करते हैं जैसे अक्षर, शब्द, वाक्यांश और पैराग्राफ वह चीज़ें हमें बच्चों को भी सिखानी चाहिए।

बच्चे का पूर्ण विकास और स्वास्थ्य कई कारकों को निर्धारित करता है: एक सुव्यवस्थित दैनिक दिनचर्या, एक संतुलित आहार, साथ ही साथ शारीरिक गतिविधि और सकारात्मक भावनाएं। एक नवजात शिशु स्वतंत्र रूप से स्थानांतरित करने में असमर्थ है। इसलिए, मालिश करना इतना आवश्यक है, जो मांसपेशियों और शरीर की अन्य प्रणालियों को मजबूत करने में मदद करता है। अनुदेश 1 निवारक मालिश लगभग हर स्वस्थ बच्चे के लिए संकेत दिया जाता है। यह शरीर के पूर्ण विकास को बढ़ावा देता है। माता-पिता इस मालिश को अपने दम पर कर सकते हैं या पेशेवर मदद ले सकते हैं। आप एक बाल रोग विशेषज्ञ के परामर्श के बाद डेढ़ से दो महीने की उम्र के पहले से ही स्वस्
बच्चे में नैतिक मूल्यों का विकास करने या उनमे संस्कार डालने की प्रथा आज से नहीं बल्कि आदि काल से चली आ रही है | हमारे धर्म ग्रंथो का यही उद्देश्य रहा है कि वह व्यक्ति के अन्दर नैतिक गुणों का विकास करें ताकि व्यक्ति स्वयं को तथा दूसरों को सही मार्ग दिखा सके | यही वजह है कि हमारे देश के संस्कार और परम्पराओं के चर्चे अन्य देशों में भी खूब होते रहे है |
- ब्लैकबोर्ड पर लिखते वक्त कई बार स्टूडेंट्स टीचर्स के पीठ पीछे शरारतें करते हैं। कई बार चॉक मारने या कागजी हवाई जहाज फेंकने के वाकये सामने आते हैं। ऐसी स्थितियों से बचने के लिए बोर्ड पर इस तरह खड़े हों कि आपकी एक नजर क्लास पर भी रहे। यानी क्लास की तरफ पूरी तरह पीठ करके खड़े होकर न लिखें। लेकिन किसी की गलती पकड़ने के बाद आप सिचुएशन को कैसे हैंडल करते हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण है। एक बार 8वीं क्लास के किसी बच्चे ने ब्लैकबोर्ड पर लिख रही अपनी टीचर पर कागज का हवाई जहाज बना कर फेंका। बजाय इस हरकत पर गुस्सा करने और क्लास को पनिश करने के टीचर ने यह कहा कि मुझे कागज का हवाई जहाज बनाना कभी नहीं आया और यह बचपन से मेरी इच्छा रही कि कोई मुझे इतना सुंदर कागजी हवाई जहाज बनाना सिखा दे। क्लास के बच्चों में से एक उठा और उसने सॉरी कहते हुए अपनी गलती न दुहराने का वादा किया। टीचर ने उसे माफ करने में एक पल न गंवाया और उससे कहा कि तुम नर्सरी के बच्चों को दो दिन उनकी क्लास में जाकर कागज के सुंदर हवाई जहाज बनाना सिखाओ और उन्हें यह भी बताओ कि वे इसे आर्ट एंड क्राफ्ट की क्लास में बनाएं, न कि दूसरे सब्जेक्ट्स की क्लास में, जब टीचर ब्लैकबोर्ड पर लिख रही हों।
नैतिक विकास में रीति – रिवाजो, प्रथाओं, परम्पराओं एवं कानूनों का अति महत्वपूर्ण स्थान होता है लेकिन जब बच्चा छोटा होता है तो उसे सामाजिक परम्पराओं के अनुसार नैतिक आचरणों की जानकारी नहीं होती है | ऐसे में आप बच्चों को खेलों के माध्यम से नैतिक मूल्यों की शिक्षा दे सकते है | जब बच्चा खेलते समय अपने साथी समूहों के बच्चों की बात नहीं मानता है तो उसपर चीखे – चिल्लाए नहीं बल्कि प्यार से समझाएं |
कई पैरंट्स इस बात पर बहुत खुश होते हैं कि उनका बच्चा मार खाकर नहीं आता, बल्कि दूसरे बच्चों को मारकर आता है और वे इसके लिए अपने बच्चे की तारीफ भी करते हैं। दूसरे लोग शिकायत करते हैं तो उलटा पैरंट्स उनसे लड़ने को उतारू हो जाते हैं कि हमारा बच्चा ऐसा नहीं कर सकता। कुछ मांएं कहती हैं कि तुम दूसरे बच्चों को मारोगे तो इंजेक्शन लगवा दूंगी, टीचर से डांट पड़वा दूंगी या झोलीवाला बाबा ले जाएगा। थोड़े दिन बाद बच्चा जान जाता है ये सारी बातें झूठ हैं। तब वह और ज्यादा पीटने लगता है।
देखा आपने कैसे अर्थ का अनर्थ होता है. दोष किसे दें. कहीं न कहीं कुछ न कुछ गलत है, अन्यथा ऐसा अनर्थ क्यों ? शायद दोष है मानकी करण न होने का. अब बताएं अंग्रेजी में किसी व्यंजन मात्र (च्) कैसे लिखेंगे. क्या वापस हिंदी में आने पर वह (च्) रह जाएगा या च अथवा चा बन जाएगा. इन सभी मुसीबतों को ध्यान में रखकर, यदि भाषा के अंग्रेजी अनुवाद की कोई तकनीक बनाई जाए, तो कईयों की भाषा सुधर जाएगी.
इसमें यहाँ तक तो मान लिया जा सकता है कि श व ष के लिए एक ही शब्द युग्म प्रयोग करें लेकिन स के लिए अलग हो . इस तरह के युग्मों में भ्रांति उत्पन्न हो रही है. जहाँ हिंदी भाषी स के लिए S का प्रयोग करते हैं वहाँ दक्षिणी लोग Sh का प्रयोग करते हैं. श के लिए हिंदी भाषी Sh का प्रयोग करते हैं तो दक्षिणी S का. श व ष हिंदी में तत्सम व तद्भव शब्दों के अलावा एक ही है सो  अहिंदी भाषियों की इतनी गलती हजम की जा सकती है. पर यदि बहुत ही सही लिखना हो तो कुछ सोचना ही पड़ेगा. हिंदी जानने पर तत्सम व तद्भव शब्दों के अनुसाप श व ष का चयन संभव है.

बच्चे में नैतिक मूल्यों का विकास करने या उनमे संस्कार डालने की प्रथा आज से नहीं बल्कि आदि काल से चली आ रही है | हमारे धर्म ग्रंथो का यही उद्देश्य रहा है कि वह व्यक्ति के अन्दर नैतिक गुणों का विकास करें ताकि व्यक्ति स्वयं को तथा दूसरों को सही मार्ग दिखा सके | यही वजह है कि हमारे देश के संस्कार और परम्पराओं के चर्चे अन्य देशों में भी खूब होते रहे है |
बतौर पाठक अपना खुद का मूल्यांकन करने के लिए आप सोच सकते हैं कि पिछले एक साल में आपने कितनी किताबें पढ़ीं? कितनी किताबों का चुनाव आपने स्वेच्छा से अपनी रूचि के अनुसार किया? कितनी किताबों को आपके मन में पढ़ने की इच्छा हुई, लेकिन आपने उस किताब को खरीदना या किसी दोस्त से लेना आगे के लिए टाल दिया। कई बार ऐसा भी होता है कि पुस्तक मेले या पियर प्रेसर में आप कई किताबें खरीद लाते हैं, लेकिन फिर वे किताबें पड़ी-पड़ी धूल फांकती हैं या फिर आलमारी की शोभा बढ़ाती हैं। उनसे बतौर सक्रिय पाठक आपकी मुलाकात नहीं होती है। पढ़ने के लिए एक प्रेरणा और मोबाइल फोन व अन्य संचार-मनोरंजन के व्यवधान से आजादी चाहिए होती है, क्योंकि ये चीज़ें आपका ध्यान पढ़ने से हटा लेती हैं। फिर पढ़ने का प्रवाह टूट जाता है और दोबारा उस किताब की तरफ बड़ी मुश्किल से लौटना होता है।
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प्रिय मित्रों , हिंदीकुंज में रंगराज अयंगर द्वारा विरचित - राजभाषा हिंदी शृंखला की समापन कड़ी के रूप में 13 वीं कड़ी, लेख के रूप में - बोलना, पढ़ना और लिखना - प्रेषित है. इन लेखों के माध्यम से अयंगर जी ने ,हिंदी राज भाषा को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखा है और अपने बहुमूल्य सुझाव भी दिए है . यदि इनके माध्यम से हिंदी प्रेमियों , साहित्य विधार्थी ,अध्यापकजन व हिंदी के माध्यम से जीविका चलाने वालों को किसी प्रकार का लाभ पहुँचता है , तो अयंगर जी का श्रम सार्थक सिद्ध होगा . आप साथ ही अपने सुझाव भी प्रकट करें ,जिससे लेखक का उत्साहवर्धन हो .
हिंदी में साधारणतः शब्दों मे आ की मात्रा को ई की मात्रा में बदल देने से पुर्लिंग शब्द स्त्रीलिंग हो जाता है जैसे साला – साली, नाला – नाली. लेकिन जहाँ अपवाद हैं वहाँ मजा किरकिरा हो जाता है. मजाक की एक और बात सुनिए -  जब कोई बनिया पूछे कि मेरी बनियाइन कहाँ है तो जवाब क्या होगा – अलमारी में या पड़ोस में. सोचिए ....कहीं जवाब हुआ कि बिस्तर पर है तो ... भगवान बचाए.
विभिन्न सर्वे रिपोर्ट में प्रदेश के पहली से आठवीं तक की कक्षाओं के अधिकतर बच्चे गणित, विज्ञान और अंग्रेजी विषयों कमजोर पाए गए हैं। इसे लेकर शिक्षा विभाग जिला बार स्कूलों का सर्वे कर रहा है। इस दौरान स्कूलों में इन तीनों विषयों में कमजोर बच्चों की सूची तैयार कर रहा है। इस दौरान सर्वे करने वाली शिक्षा विभाग की टीम शिक्षक की जिम्मेदारी भी तय करती है कि एक या दो माह के दौरान कमजोर बच्चों का ज्ञान बढ़ा कर उन्हें अन्य बच्चों के साथ कक्षा में बैठाया जाए।
4 मत्ती 28:19, 20 पढ़िए। बाइबल में बपतिस्मा लेने की कोई उम्र नहीं दी गयी है। लेकिन माता-पिताओं को मत्ती 28:19 में दी बात पर गौर करना चाहिए। वहाँ यीशु ने आज्ञा दी कि लोगों को मेरा “चेला बनना सिखाओ।” इससे पता चलता है कि एक व्यक्‍ति को पहले सिखाया जाना ज़रूरी है, तभी वह शिष्य या चेला बन सकता है। चेला उसे कहते हैं जो यीशु की शिक्षाओं को सीखता है, उन्हें समझता है और उन पर चलना चाहता है। इसलिए माता-पिताओं का यह लक्ष्य होना चाहिए कि वे अपने बच्चों को छुटपन से ही सिखाएँ ताकि वे यहोवा को अपना जीवन समर्पित कर सकें और मसीह के चेले बन सकें। बेशक दूध-पीते बच्चे बपतिस्मा लेने के योग्य नहीं होते। मगर बाइबल बताती है कि छोटे बच्चे भी बाइबल की सच्चाइयाँ समझ सकते हैं।
इस घटना में कि एक बच्चा सामान्य रूप से विकसित होता है और वह सब कुछ जो वह कर सकता है, उसे नए ज्ञान और कौशल के साथ अतिभारित होने की आवश्यकता नहीं है। माता-पिता के इस दृष्टिकोण में कुछ भी अच्छा नहीं है, और बच्चे के लिए यह उबाऊ हो सकता है। इस मामले में एक वर्षीय बच्चे का विकास एक खेल प्रक्रिया का अर्थ है, जिसमें आप पहले से ही कुछ सिखाने वाले तत्वों को ला सकते हैं। याद रखें कि इस उम्र में, सर्वश्रेष्ठ बच्चे तुकबंदी और गायन पर प्रतिक्रिया करते हैं। इससे उनकी शब्दावली के विकास और नए ज्ञान और कौशल प्राप्त करने में रुचि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
इसमें यहाँ तक तो मान लिया जा सकता है कि श व ष के लिए एक ही शब्द युग्म प्रयोग करें लेकिन स के लिए अलग हो . इस तरह के युग्मों में भ्रांति उत्पन्न हो रही है. जहाँ हिंदी भाषी स के लिए S का प्रयोग करते हैं वहाँ दक्षिणी लोग Sh का प्रयोग करते हैं. श के लिए हिंदी भाषी Sh का प्रयोग करते हैं तो दक्षिणी S का. श व ष हिंदी में तत्सम व तद्भव शब्दों के अलावा एक ही है सो  अहिंदी भाषियों की इतनी गलती हजम की जा सकती है. पर यदि बहुत ही सही लिखना हो तो कुछ सोचना ही पड़ेगा. हिंदी जानने पर तत्सम व तद्भव शब्दों के अनुसाप श व ष का चयन संभव है.

हालांकि, अगर कोई बच्चा 5 साल की उम्र से पहले स्पष्ट रूप से पढ़ रहा है, तो यह सुझाव देता है कि वह उन्नत है क्योंकि उसके दिमाग उस आयु सीमा के परिपक्वता के पर्याप्त स्तर तक पहुंच गया है। लेकिन अगर किसी बच्चे ने औपचारिक निर्देश प्राप्त करने से पहले उसे पढ़ना सिखाया है, तो संभावना है कि उस बच्चे को उपहार दिया जाए। कोई फर्क नहीं पड़ता कि परिणाम क्या है, बच्चों को किताबों में रुचि और कम उम्र में पढ़ना उन्हें भविष्य की सफलता के लिए तैयार करेगा।
एक शब्द है रबर. इसका उच्चारण कहीं रबड़ होता है कहीं रबर. आज दोनों उच्चारण सही मान लिए गए हैं पर कौन सा मूल रूप है, इसकी खबर शायद ही किसी को हो. मलयालम व तमिल भाषाओं में ऐसे कई शब्द हैं जिन्हें उच्चरित करना अन्यों के लिए बहुत ही मुश्किल यानी असंभव समान है. उस उच्चारण को सही ढंग से हिंदी (देवनागरी) लिपि में लिखा भी नहीं जा सकता. ऐसे मे हिंदी भाषी गलती तो करेगा ही. उसी तरह हिंदी में अन्य गलती करते हैं. यह किसी भी दूसरी भाषा - भाषियों के बारे में कहा जा सकता है.

दोस्तों आपको अपने बच्चो को अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी सिखानी होगी और अगर आप महाराष्ट्र के है तो मराठी सिखानी होगी या अगर आप गुजरात के है तो आपको अपने बच्चो को गुजराती सिखानी होगी। इसके बाद उसे इंटरनॅशनल लैंग्वेज इंग्लिश सिखानी होगी। आप बच्चे को दोनों भाषाओं में भी सिखा सकते हैं। इससे उसे अंग्रेजी में बेहतर बोलने में सहायता मिलेगी और स्कूल शुरू होने के बाद भी बेहतर पढ़ा जा सकेगा।  इसके बाद अपने बच्चे के शिक्षक से बात करें और अपने बच्चे को एक बेहतर पाठक बनाने के लिए आप अपने प्रयासों का उल्लेख करें।

- बच्चे का बैग रेग्युलर चेक करें, लेकिन ऐसा उसके सामने न करें। उसमें कोई भी नई चीज नजर आए तो पूछें कि कहां से आई? बच्चा झूठ बोले तो प्यार से पूछें। उसकी बेइज्जती न करें, न ही उसके साथ मारपीट करें। चीज लौटाने को कहें लेकिन पूरी क्लास के सामने माफी न मंगवाएं। बच्चा अगर पांच साल से बड़ा है, तब तो बिल्कुल नहीं। वह क्लास के सामने बोल सकता है कि यह चीज मुझे मिल गई थी।

एक दशक पहले, बच्चों को रजिस्ट्री कार्यालय में अपने माता-पिता के पासपोर्ट में अनिवार्य रूप से दर्ज किया गया था, जहां उन्होंने पहले बच्चों के दस्तावेज - एक जन्म प्रमाण पत्र जारी किया था। अब, ऐसा करने के लिए, आपको जिले के पासपोर्ट कार्यालय में जाना होगा, भले ही आप अपने रूसी या अंतर्राष्ट्रीय पासपोर्ट में बच्चे को दर्ज करना चाहते हों। अनुदेश 1 पासपोर्ट में बच्चे को दर्ज करने के लिए, आपके पास निम्नलिखित दस्तावेज होने चाहिए: आपका रूसी पासपोर्ट, पासपोर्ट और बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र। आपको दो प्रतियों में पासपोर्ट में एक बच्चे के पंजीकरण के लिए एक आवेदन भी भरना होगा। दस्तावेजों के इस पैकेज के आधार पर,
इस तरह का अभ्यास लगातार होना चाहिए ताकि बच्चों का इतना अभ्यास हो जाए कि वर्ण के साथ मात्रा के प्रतीक को देखते ही वे झट से अनुमान लगा लें कि इसको कैसे बोला जाएगा। वे कहते हैं कि यहां तक आने में बच्चों को समय लगता है, जो बच्चे रटकर यहां तक पहुंचते हैं वे थोड़ी देर ठहरते तो हैं मगर समझकर पढ़ने वाले बच्चों की तुलना में उनके पढ़ने की रफ़्तार (रीडिंग स्पीड) कम होती है।
उम्र के साथ ब्रेस्टमिल्क खो जाने और अधिक ठोस खाद्य पदार्थों में जाने से बच्चे को तरल पदार्थ के साथ शरीर को फिर से भरने की आवश्यकता महसूस होने लगती है। पेय के लिए धन्यवाद, उसे अतिरिक्त विटामिन मिलते हैं, तत्वों का पता लगाते हैं और बस प्यास बुझाते हैं। बच्चे को देने के लिए क्या उपयोगी है? बच्चों के लिए स्वस्थ पेय छह महीने की उम्र से, बच्चे प्राकृतिक रस, विभिन्न फलों के पेय और शोरबा को आत्मसात करना शुरू कर देते हैं। समय के साथ, बच्चे के आहार को केफिर, चुंबन, कॉम्पोट्स और अन्य बच्चों के पेय के साथ फिर से भरना है। पहले फलों के लिए खाद्य पदार्थ ताजा प्राकृतिक रस का उपयोग करते हैं। अधिकतर यह सेब का रस
गेमिफिकेशन के माध्यम से ‘स्पाइसटून्स’ युवा उपयोगकर्ताओं को विभिन्न गतिविधियों में लगाकर उनके शैक्षणिक ज्ञान और सामाजिक कौशल को तराशने का काम करता है वह भी पहले ही दिन के खेल से। ‘स्पाइसटून्स’ पर सीखने की प्रक्रिया हमारे देश में सदियों से प्रचलित रटने की विधी से एकदम से उलट है। ‘स्पाइसटून्स’ बच्चों को पारंपरिक शिक्षा प्रणाली के साथ-साथ अनुभवात्मक अभ्यास का भी मौका उपलब्ध करवाती है।
बच्चे को प्रोत्साहित करें – अगर आप चाहते हैं कि बच्चा कोई भी काम अच्छे से करे, तो उसके लिए उसे प्रोत्साहित करना सबसे ज्यादा जरूरी है। लिखने की कला सिखाने में भी यह जरूरी है। अगर बच्चा जरा सा भी पेन चलाए, कुछ बनाए तो उसे प्रोत्साहित करें। दूसरे बच्चों का नाम लेकर उसकी तुलना करते हुए अपने बच्चे को जीनियस बताएं। इससे वह और अच्छा करेगा। उसे कभी भी हतोत्साहित न करें, ये बातें न कहें कि तुम्हें तो कुछ नहीं आता।
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